लघुकथा – सुर्ख़ गुलाब

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लेखा पति का इंतज़ार बड़ी शिद्दत से कर रही थी । प्यार के इज़हार का स्पेशल दिन जो था आज । वो पति के साथ बिताए प्रेमिल क्षणों के बारे में सोच रही थी ।
एक बेबात की नोक- झोंक के बाद , बेटी गुड्डन ममी – पापा के बीच अबोला देख रही थी ।
वो ऑफ़िस से देर से लौटा । उसने अपनी कई मजबूरियाँ लेखा को सुनाते हुए गुड्डन को गिना दीं ।

इसबार कंपनी ने वेतन अपरिहार्य कारणों से वितरित नहीं किया था ।
वो आॅफ़िस से लौटते हुए गुलाब खरीदने गया था । शाम तक सारे गुलाब के फूल बिक चुके थे । बची – बचाई बासी पंखुड़ियों के मनमाने भाव माँग रहा था फ्लोरिस्ट । प्यार के इज़हार को कॉमर्शियल रंग में रंगा देख उसे दुख हुआ…।
” घत्त नहीं लेता ।” पाॅकेट भी हल्की हो हक्ला रही थी आज… ।
“इसकी क्या ज़रूरत ? केवल मनी वेस्टेज … । ” खुद के तर्क और उत्तर भी ।
पत्नी ने पुलकित मन से इंतज़ार किया था । पर पति देर से घर पहुँचा और वो भी खाली हाथ हिलाते हुए । दोनों के बीच लंबी चुप देख गुड्डन को गुलाब के फूल , देने – लेने की पड़ोसी आंटी की बात अचानक याद हो आई ।
उसने स्कूल बैग से ड्राइंग – काॅपी निकालकर ममी – पापा के बीच रख दी , जिसपर सुर्ख़ लाल गुलाब बना था ।

चुप्पी जोर से तड़की और खिलखिलाहट , कूदकर उनके बीच बैठ गई ।
गुड्डन ममी – पापा के गले में प्यार से बाँहें डालकर झूल गई … ।

प्यार का त्योहार मनाने के लिये किस कम्बख्त को नकली – असली फूल की ज़रूरत थी अब । लेखा को प्यार से निहारते हुए उसने गुड्डन की काॅपी में बड़ा सा ‘ गुड ‘ दे दिया था ।

 – विभा रश्मि

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